जिसने मन को जीता उसने जीत लिया जग

"चेंज योर हैविट, चेंज योर लाईफ"

यह बात 100 प्रतिशत सही है कि आप अपनी आदतें बदल लीजिए तो आपकी जिन्दगी पूरी बदल जायेगी।

आपको अपनी जिन्दगी बदलना है तो-

आपको नियमित सुबह जल्दी उठना होगा, नियमित पठन-पाठन करना होगा, नियमित व्यायाम करना होगा और वक्त को बर्बाद करने वाली चीजों के आकर्षण से दूर रहना होगा।भगवान श्रीकृष्ण ने भी यही राह दिखाई है।
            सफलता के लिए लग जायें कटिबद्ध हों नियमित अभ्यास करें, मन से हर दिन लडने के लिए तैयार हो जायें स्वयं से कठोर होने के लिए तैयार हो जायें सफलता स्वागत के लिए प्रतीक्षा करेगी...

युद्ध 

युद्ध शब्द कानों मे पडते ही मन-मस्तिष्क में अलग-अलग प्रकार के दृश्य घूमने लगते हैं। पर एक ऐसा युद्ध भी है, जो अविरत जारी रहता है- ये हमारे अपने ही भीतर मन के साथ होने वाला घनघोर युद्ध है।
           पृथ्वी पर हर व्यक्ति जो जन्म लेता है किसी न किसी अरमान या चाहत के साथ जीवन की यात्रा का श्रीगणेश करता है। सपने होते हैं, उमंग-उत्साह का जोर भी होता है। बुद्धि, शक्ति और उल्लास का प्रचंड प्रवाह भी होता है, लेकिन मन रूपी जो शत्रु है वह लक्ष्य तक पहुंचने नहीं देता है।
          ये अवलोकन करने योग्य है- दिन का आरंभ होता है, अलार्म बजता है। रात में तय किया होता है कि सुबह 6 बजे उठ जाना है। अलार्म की घंटी बजते ही अन्दर से कोई कहता है 'बस 5 मिनट' और यहीं हम स्वयं से छल कर 5 से 50 मिनट बिता देते हैं। 
          अहम सवाल यह है कि- कौन है ये? स्कूल-कालेज के नये शिक्षा सत्र के आरंभ में शुभ संकल्प करते हैं कि- इस बार शुरुआत से ही लगन के साथ अच्छी मेहनत करनी है और कोई "कल से शुरू करते हैं" कहकर छल कर बैठता है खुद से।
          और ये कल कभी भी आता ही नही, बल्कि हमारे हर पल 24 घन्टे खा जाता है। अन्ततः हर साल की तरह परीक्षा के 15 दिन पहले ही कॉपी-किताबों से पढ़ाई का श्रीगणेश होता है! ये छलिया कौन है? कोई खान-पान मे संयम का संकल्प करता है, आसन पर बैठते ही हलचल शुरू हो जाती है- बल मिलता है कि ठीक है इतना तो चलता है। बस फिर क्या है "इतना तो..." मिष्ठान-चटपटे पकवान, जंकफूड के कई पैकेट हजम करवा देता है। 

मन जीता, जग जीता

           सवाल स्वाभाविक है कि कौन है वह, जो हमारे शरीर मे इस घोर शत्रु को दाखिल करवा देता है? ऐसे उदाहरणों की अंतहीन श्रंखला है। ये पढते हुए सम्भव है कि आपके चेहरे पर मुस्कान तैर गई हो, यह भी सम्भव है कि कहीं न कहीं आपने स्वयं का प्रतिबिंब किसी उदाहरण में देख लिया हो! यह मुस्कराहट ही हमारे लिए चिन्तन-मनन की घंटी है। वेक-अप काॅल है कि हमारा शत्रु और कहीं नहीं, खुद हमारे भीतर बना हुआ है, पैर हमेशा नीचे की ओर खींच रहा है। आपकी बर्बादी ही इसका उद्देश्य (लक्ष्य) है। यही है मन संग युद्ध। इसलिए कहा जाता है कि- जिसने मन को जीता उसने जग जीता।
           जैस-जैसे हम मन को जीतते जाते हैं हमारी विजय निश्चित होती जाती है। ऐसा नहीं है कि सफल व्यक्तियों को प्रातःकाल उठना, व्यायाम करना, पढना-लिखना और श्रम करना बहुत अच्छा लगता है। इस सब की लय पाने के लिए उन्हें भी बहुत मेहनत करनी पडती है। स्वयं के साथ कठोर होकर मन को काबू करना होता है। लगातार मन को पराजित करने के बाद उनके लिए विजय की श्रंखला आकार लेने लगती है। दूसरी ओर हमेशा मन के आगे पस्त होने वाले साधारण व्यक्तियों के सपने सिर्फ सपने ही रह जाते हैं।
            सहज सवाल उठता है कि मन के आगे की लाचारी तो हम भी जानते हैं लेकिन इस युद्ध मे विजयश्र कैसे पायें? महाभारत के युद्ध में अर्जुन श्रीकृष्ण के सम्मुख स्वीकारोक्ति के साथ कहते हैं- हे कृष्ण, मन निश्चित ही चंचल, विक्षेप पैदा करने वाला, दृढ़ और बलवान है, इसे वस में करना वायु को रोकने जैसा दुष्कर मानता हूँ। इसके उत्तर में भगवान श्रीकृष्ण मन को जीतने के रहस्य को उद्घाटित करते हैं- हे कौन्तेय, अभ्यास और वैराग्य से मन को वश में किया जा सकता है। अभ्यास अर्थात लक्ष्य की ओर बढाने वाली आदतें- ऐसे कार्यों का पुनरावर्तन। वैराग्य का अर्थ है लक्ष्य से विचलित करने वाली वस्तुओं से दूर रहना। यही है रहस्य मन को जीत कर, जीवन में जीतने का।...

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